Breakthrough breakdown of marriage अपरिवर्तनीय विवाह विच्छेद: 17 साल के अलगाव के बाद सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दिया तलाक का आदेश?
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पृष्ठभूमि
सुप्रीम कोर्ट ने 26 मार्च, 2025 को एक महत्वपूर्ण फैसले में “अपरिवर्तनीय विवाह विच्छेद” (Irretrievable Breakdown of Marriage) के आधार पर तलाक को मंजूरी देते हुए पति को 40 लाख रुपये का स्थाई गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। यह मामला गजेंद्र सिंह (अपीलार्थी) और रीना बाल्मीकि (प्रतिवादी) के बीच 17 साल से चले आ रहे कानूनी विवाद का अंतिम पड़ाव साबित हुआ। आइए, केस की पूरी कहानी और न्यायालय की टिप्पणियों को विस्तार से समझते हैं।
मामले की पृष्ठभूमि: 2006 का विवाह और 2007 का अलगाव
पक्षकार:
अपीलार्थी: गजेंद्र सिंह (पति)
प्रतिवादी: रीना बाल्मीकि (पत्नी)
विवाह और अलगाव:
दोनों का विवाह 6 अक्टूबर, 2006 को हिंदू रीति-रिवाजों के तहत संपन्न हुआ। हालाँकि, विवाह के सिर्फ 14 महीने बाद दिसंबर 2007 में दोनों अलग हो गए। पति का दावा था कि पत्नी ने स्वेच्छा से घर छोड़ दिया, जबकि पत्नी ने दहेज उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाया।पहला कानूनी दावा:
पत्नी ने 2007 में ही क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ते का केस दायर किया। 2010 में न्यायिक मजिस्ट्रेट ने उन्हें 5,000 रुपये मासिक भत्ता देने का आदेश दिया।दूसरा केस:
2015 में पत्नी ने घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 (DV Act) के तहत शिकायत दर्ज की और अंतरिम गुजारा भत्ता माँगा। 2016 में न्यायालय ने उन्हें 15,000 रुपये मासिक अतिरिक्त भत्ता और आवास का अधिकार दिया।
हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक का सफर
हाई कोर्ट का आदेश (2022):
पति ने हाई कोर्ट में रिविजन याचिका दायर कर CrPC के तहत दिए 5,000 रुपये को DV Act के 15,000 रुपये से समायोजित करने की माँग की। हाई कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया।सुप्रीम कोर्ट में अपील (2025):
केस: क्रिमिनल अपील संख्या 2025 (एसएलपी (Crl.) 12249/2023)
पति ने अनुच्छेद 142 के तहत विवाह विच्छेद और स्थाई गुजारा भत्ते के निपटारे की माँग की।
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ: क्यों माना “अपरिवर्तनीय विवाह विच्छेद”?
1. 17 साल का अलगाव और संबंधों का टूटना
कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्ष 2007 से अलग रह रहे हैं और उनके बीच कोई संतान नहीं है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और प्रसन्न बी. वराले की पीठ ने कहा, “17 साल का अलगाव और लगातार कानूनी लड़ाई ने विवाह को पूरी तरह खत्म कर दिया है। ऐसे में, विवाह को जारी रखने का कोई तर्क नहीं बनता।”
2. स्थाई गुजारा भत्ता: 40 लाख रुपये का आधार
पति की आय: पति सरकारी कॉलेज में लेक्चरर हैं। उनका दावा है कि उनकी मासिक आय 91,030 रुपये है, जबकि पत्नी ने इसे 1.34 लाख रुपये बताया।
पत्नी की स्थिति: पत्नी बेरोजगार हैं और उन्हें पहले से ही आवास का अधिकार प्राप्त है।
कोर्ट का निर्णय: सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, पति को 40 लाख रुपये एकमुश्त भुगतान करने का आदेश दिया गया। यह रकम पत्नी के सभी भविष्य और लंबित दावों को समाप्त करेगी।
3. अनुच्छेद 142 का उपयोग: विवाद का अंतिम समाधान
सुप्रीम कोर्ट ने शिल्पा सैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन (2023) के मामले का हवाला देते हुए अनुच्छेद 142 के तहत विशेष शक्तियों का प्रयोग किया। कोर्ट ने कहा, “जहाँ विवाह पूरी तरह टूट चुका है, वहाँ न्यायालय को समाज के हित में फैसला लेना चाहिए।”
विशेषज्ञों की राय: कानून और समाज पर प्रभाव
कानूनी विशेषज्ञ डॉ. अंकिता शुक्ला कहती हैं, “यह फैसला उन जटिल मामलों में मिसाल बनेगा जहाँ पति-पत्नी दशकों से अलग रह रहे हैं। अनुच्छेद 142 का उपयोग कर न्यायालय ने एक व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत किया है।”
समाजशास्त्री डॉ. रोहित वर्मा का मानना है कि “इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ है कि लंबे अलगाव को विवाह टूटने का प्रमुख आधार माना जाएगा। हालाँकि, गुजारा भत्ते की रकम पर विवाद अभी भी जारी रह सकते हैं।”
निष्कर्ष: विवाह और कानून की नई परिभाषा
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने “अपरिवर्तनीय विवाह विच्छेद” को तलाक का वैध आधार बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम उठाया है। साथ ही, यह केस दिखाता है कि न्यायालय लंबे समय से चले आ रहे पारिवारिक विवादों को समाप्त करने के लिए कितना गंभीर है।
इस फैसले के बाद, यह स्पष्ट है कि भारतीय न्याय प्रणाली अब विवाह के टूटने के मामलों में मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपना रही है। यह न केवल पक्षकारों को न्याय देता है, बल्कि समाज में कानून के प्रति विश्वास भी बढ़ाता है।
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