माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत बेटे के निष्कासन पर सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
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माता-पिता के खिलाफ बेटे के निष्कासन पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे मामले में अपना निर्णय सुनाया, जिसमें एक वरिष्ठ नागरिक महिला ने अपने बेटे को घर से निकालने की मांग की थी। यह मामला माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक अधिनियम 2007 के तहत उठाया गया था, जिसमें संपत्ति के अधिकार और पारिवारिक विवाद को लेकर गहन बहस हुई। कोर्ट ने अंततः हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए बेटे के निष्कासन को खारिज कर दिया।
केस का पृष्ठभूमि और पक्षकार
यह मामला उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के एक परिवार से जुड़ा है। कल्लू मल (मृत) और उनकी पत्नी संतोला देवी (अपीलार्थी) के तीन बेटे और दो बेटियां थीं। परिवार के बीच संपत्ति को लेकर विवाद शुरू हुआ जब कल्लू मल ने अपनी बेटियों और दामाद को घर के कुछ हिस्से गिफ्ट या बेच दिए। इसके बाद, बेटे कृष्ण कुमार (प्रतिवादी) ने दावा किया कि उनका घर में 1/6 हिस्सा है।
संपत्ति विवाद की शुरुआत
कल्लू मल ने 2014 में एसडीएम के पास शिकायत दर्ज की कि उनका बड़ा बेटा कृष्ण कुमार उन्हें शारीरिक और मानसिक प्रताड़ित करता है। 2017 में, कल्लू मल और संतोला देवी ने बेटों के खिलाफ मेंटेनेंस केस (क्रिमिनल केस नंबर 828/2017) दायर किया, जिसमें फैमिली कोर्ट ने हर महीने 8,000 रुपये का भरण-पोषण तय किया।
ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट के आदेश
2019 में, कल्लू मल और संतोला देवी ने वरिष्ठ नागरिक अधिनियम 2007 के तहत केस नंबर 2527/2019 दायर कर बेटे कृष्ण कुमार को घर से निकालने की मांग की। मेन्टेनेंस ट्रिब्यूनल ने कृष्ण कुमार को केवल एक कमरे और दुकान तक सीमित रखने का आदेश दिया। हालांकि, अपीलीय ट्रिब्यूनल ने उनके निष्कासन का आदेश पारित किया।
इसके बाद, कृष्ण कुमार ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में रिट याचिका (नंबर 35884/2009) दायर की। हाई कोर्ट ने निष्कासन के आदेश को रद्द कर दिया, लेकिन ट्रिब्यूनल के अन्य निर्देशों को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और कानूनी तर्क
सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपील नंबर ____/2025 में अपने फैसले में कहा कि:
संपत्ति का स्वामित्व विवादित है: कल्लू मल ने संपत्ति के कुछ हिस्से बेटियों को ट्रांसफर कर दिए थे। इसलिए, यह साबित नहीं होता कि संपत्ति पूरी तरह से उनकी थी।
निष्कासन अंतिम विकल्प होना चाहिए: कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम में निष्कासन की प्रक्रिया केवल तभी लागू होती है जब सीनियर सिटीजन की सुरक्षा जरूरी हो।
कृष्ण कुमार का तर्क: उन्होंने दावा किया कि वे पैरेंट्स को मेंटेनेंस दे रहे हैं और सिविल कोर्ट में अपने हिस्से का केस लड़ रहे हैं।
कोर्ट ने उर्मिला दीक्षित बनाम सुनील शरण दीक्षित (2025) केस का हवाला देते हुए कहा कि निष्कासन का आदेश “अनिवार्य” नहीं है।
केस के प्रमुख सबक
संपत्ति का स्पष्ट दस्तावेजीकरण: परिवारों को चाहिए कि वे संपत्ति के बंटवारे को लेकर कानूनी दस्तावेज तैयार करें।
वरिष्ठ नागरिक अधिनियम की सीमाएं: यह अधिनियम मुख्य रूप से भरण-पोषण के लिए है, न कि निष्कासन के लिए।
पारिवारिक विवादों का शांतिपूर्ण समाधान: अदालतों ने सलाह दी कि परिवार मध्यस्थता के जरिए झगड़े सुलझाएं।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकार और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। हालांकि, यह केस यह भी दिखाता है कि कानूनी प्रक्रियाएं लंबी और जटिल हो सकती हैं। परिवारों को चाहिए कि वे संपत्ति विवादों से बचने के लिए समय रहते कानूनी सलाह लें।
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