Landmark judgement अपमान याचिका और दिवालिया प्रक्रिया: सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज की छत्तीसगढ़ की कर मांगें?
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“अपमान याचिका और दिवालिया प्रक्रिया”
सुप्रीम कोर्ट ने 27 मार्च, 2025 को “अपमान याचिका और दिवालिया प्रक्रिया” से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में छत्तीसगढ़ सरकार के कर अधिकारियों के खिलाफ फैसला सुनाया। कोर्ट ने M/S JSW स्टील लिमिटेड की याचिका स्वीकार करते हुए राज्य के कर विभाग द्वारा जारी 4.36 करोड़ रुपये की अवैध मांगों को रद्द कर दिया। यह फैसला दिवालिया और दिवालियापन संहिता (IBC) के प्रावधानों की स्पष्ट व्याख्या करता है।
मामले की पृष्ठभूमि: JSW स्टील बनाम छत्तीसगढ़ कर विभाग
पक्षकार और केस विवरण:
याचिकाकर्ता (अपीलार्थी): M/S JSW स्टील लिमिटेड (पूर्व में मोननेट इस्पात एनर्जी लिमिटेड)
प्रतिवादी (अलleged Contemnors): प्रतिष्ठा ठाकुर हरितवाल (सहायक आयुक्त, वाणिज्यिक कर) और अन्य
केस संख्या: Contempt Petition (Civil) No. 629/2023 (Writ Petition (Civil) No.1177/2020 में)
प्रकरण प्रकार: सिविल अवमानना याचिका (अनुच्छेद 129 और 142 के तहत)
घटनाक्रम:
दिवालिया प्रक्रिया का इतिहास:
2017 में मोननेट इस्पात के खिलाफ IBC के तहत दिवालिया प्रक्रिया शुरू हुई।
2018 में JSW स्टील को Successful Resolution Applicant (SRA) घोषित किया गया।
NCLT ने 24 जुलाई, 2018 को रिज़ॉल्यूशन प्लान मंजूर किया।
राज्य कर विभाग की मांगें:
2021-22 में छत्तीसगढ़ कर विभाग ने JSW स्टील पर 1.08 करोड़ (केंद्रीय कर), 2.66 करोड़ (राज्य वैट), और 61.51 लाख (प्रवेश कर) का दावा किया।
यह मांग 1 अप्रैल, 2017 से 30 जून, 2017 की अवधि के लिए थी।
सुप्रीम कोर्ट का पूर्व निर्णय (2021):
घनश्याम मिश्रा बनाम एडलवाइस एसेट रिकन्स्ट्रक्शन (2021): कोर्ट ने फैसला दिया कि रिज़ॉल्यूशन प्लान स्वीकृत होने के बाद, सभी लंबित दावे समाप्त हो जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ: क्यों माना गया अवमानना?
1. IBC का स्पष्ट प्रावधान: “क्लीन स्लेट” सिद्धांत
कोर्ट ने कहा कि “रिज़ॉल्यूशन प्लान मंजूर होने के बाद, SRA कंपनी को बिना किसी पुराने दबाव के चलाने का अधिकार है।” छत्तीसगढ़ कर विभाग ने 2017 की मांगें दोबारा उठाकर IBC के नियमों का उल्लंघन किया।
2. अवमानना का आधार: घनश्याम मिश्रा केस की अवहेलना
JSW स्टील ने कर अधिकारियों को 2021 और 2022 में कई बार सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अवगत कराया, लेकिन मांगें जारी रहीं।
न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और ए.जी. मसीह की पीठ ने कहा, “राज्य अधिकारियों का कार्यवाही जारी रखना न्यायालय के आदेश की अवमानना है।”
3. राज्य का तर्क और कोर्ट की प्रतिक्रिया
राज्य का दावा: “हमें IBC प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया था, इसलिए हमारे दावे मान्य हैं।”
कोर्ट का जवाब: “सार्वजनिक नोटिस के बावजूद, राज्य ने अपना दावा दर्ज नहीं किया। इसलिए, रिज़ॉल्यूशन प्लान के बाद मांगें गैर-कानूनी हैं।”
प्रमुख न्यायिक निर्णयों का हवाला
1. घनश्याम मिश्रा केस (2021):
निर्णय: “रिज़ॉल्यूशन प्लान स्वीकृत होने के बाद, सभी गैर-शामिल दावे समाप्त हो जाते हैं।”
प्रभाव: केंद्र, राज्य और स्थानीय प्राधिकारी भी इसके दायरे में आते हैं।
2. रेनबो पेपर्स केस (2023):
तथ्य: गुजरात कर विभाग ने दिवालिया प्रक्रिया में दावा दर्ज किया, लेकिन CoC ने इसे खारिज कर दिया।
निर्णय: “CoC को सभी दावों को ध्यान में रखना चाहिए।”
वर्तमान केस में अंतर: छत्तीसगढ़ ने दावा ही नहीं दर्ज किया, इसलिए रेनबो पेपर्स लागू नहीं।
अपमान याचिका और दिवालिया प्रक्रिया
विशेषज्ञ राय: कानूनी और आर्थिक प्रभाव
कानूनी विशेषज्ञ डॉ. अरुण मिश्रा:
“यह फैसला IBC के उद्देश्य को मजबूत करता है। कंपनियों को दिवालिया प्रक्रिया के बाद नई शुरुआत करने का अधिकार मिलना चाहिए।”
अर्थशास्त्री प्रो. रितु सिंह:
“राज्यों को IBC प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी करनी चाहिए। देरी से दावे करने से निवेशकों का विश्वास डगमगाता है।”
निष्कर्ष: IBC की शक्ति और सीमाएँ
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने “अपमान याचिका और दिवालिया प्रक्रिया” के तहत एक मिसाल कायम की है। यह स्पष्ट करता है कि रिज़ॉल्यूशन प्लान के बाद पुराने दावों को उठाना कानूनी अवमानना है। हालाँकि, कोर्ट ने छत्तीसगढ़ अधिकारियों को दंडित न करके उनकी बिना शर्त माफी स्वीकार की, जो भविष्य में सतर्कता की गुंजाइश छोड़ता है।
यह फैसला व्यावसायिक पारदर्शिता और कानून के शासन को बढ़ावा देता है। कंपनियाँ अब दिवालिया प्रक्रिया के बाद नए सिरे से काम करने के लिए प्रोत्साहित होंगी, बिना पुराने दबावों के।
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