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सुप्रीम कोर्ट ने प्रदीप शर्मा को दी अग्रिम जमानत, FIR बरकरार | गुजरात सरकार बनाम आईएएस अधिकारी

गुजरात के भूमि आवंटन मामले में आईएएस अधिकारी प्रदीप शर्मा के खिलाफ FIR बरकरार, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने दी अग्रिम जमानत। जानें फैसले के मुख्य बिंदु।

सुप्रीम कोर्ट ने आईएएस अधिकारी प्रदीप शर्मा को अग्रिम जमानत दी, FIR रही बरकरार

28 फरवरी 2025, नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने गुजरात के भूमि आवंटन मामले में आईएएस अधिकारी प्रदीप निरंकारनाथ शर्मा के खिलाफ दर्ज FIR को बरकरार रखा है, लेकिन उन्हें अग्रिम जमानत प्रदान की है। यह फैसला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस प्रसन्न बी. वराले की पीठ ने सुनाया। मामला 2011 में राजकोट (ग्रामीण) के टंकारा पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR संख्या 33/2011 से जुड़ा है, जिसमें शर्मा पर IPC की धारा 409 (आपराधिक विश्वासघात), 219 (न्यायिक प्रक्रिया में अनुचित लाभ) और 114 (साझी मंशा) के तहत आरोप लगाए गए थे।


मामले की पृष्ठभूमि: 65 एकड़ सरकारी जमीन का विवाद

  • 1970 का आवंटन: गांव आनंदपाड़ा की 65 एकड़ सरकारी जमीन D.J. मेहता और अन्य को सांठी (व्यक्तिगत खेती के लिए) आवंटित की गई।

  • 2000 में रद्दीकरण: डिप्टी कलेक्टर ने जमीन जब्त कर ली, क्योंकि आवंटित लोग विदेश में रह रहे थे और खेती नहीं कर रहे थे।

  • 2008 में शर्मा का फैसला: तत्कालीन कलेक्टर प्रदीप शर्मा ने डिप्टी कलेक्टर के आदेश को पलट दिया और जमीन आवंटित लोगों को वापस सौंपी।

  • 2011 में FIR: शिकायतकर्ता (मामलतदार) ने आरोप लगाया कि शर्मा ने जानबूझकर सरकारी जमीन का गलत आवंटन किया।


सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु

  1. FIR बरकरार: कोर्ट ने कहा कि आरोप गंभीर हैं और इनकी जांच जरूरी है। शर्मा पर अधिकारियों का दुरुपयोग करने का आरोप है।

  2. अग्रिम जमानत मंजूर: हालांकि, कोर्ट ने शर्मा को 1 लाख रुपये के व्यक्तिगत बॉन्ड पर जमानत दी, क्योंकि:

    • मामला कागजी सबूतों पर आधारित है।

    • शर्मा ने जांच में सहयोग का आश्वासन दिया।

    • कोई हिरासत जरूरी नहीं, क्योंकि शारीरिक अपराध नहीं हुआ।


क्यों विवादित है शर्मा का आदेश?

  • समयसीमा का उल्लंघन: शर्मा ने 7 साल की देरी से दायर अपील को स्वीकार किया।

  • अधिकार क्षेत्र का सवाल: शर्मा का तबादला 24 मार्च 2008 को हो चुका था, लेकिन उन्होंने 27 मार्च 2008 को आदेश पारित किया।

  • मृत लोगों के लिए अपील: आवंटित लोगों में से दो की मृत्यु हो चुकी थी, लेकिन उनके पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर आदेश दिया गया।


कोर्ट की टिप्पणियाँ और तर्क

  • जस्टिस विक्रम नाथ: “यह मामला सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग से जुड़ा है। शर्मा का आदेश संदिग्ध परिस्थितियों में पारित हुआ।”

  • जस्टिस वराले: “हिरासत जरूरी नहीं, क्योंकि शर्मा सेवानिवृत्त हैं और जांच में बाधा नहीं डालेंगे।”


गुजरात सरकार का पक्ष

  • शर्मा पर 10 FIR दर्ज हैं, जिनमें 150 एकड़ सरकारी जमीन के गैरकानूनी आवंटन का आरोप शामिल है।

  • सरकार ने दावा किया कि शर्मा ने भ्रष्ट तरीके से निर्णय लेकर सरकार को नुकसान पहुँचाया।


अग्रिम जमानत की शर्तें

  1. शर्मा को जांच में पूरा सहयोग देना होगा।

  2. यदि जांच एजेंसी को हिरासत जरूरी लगे, तो वह मजिस्ट्रेट से अनुमति ले सकती है।


विशेषज्ञों की राय

  • डॉ. रवि शर्मा, कानून विशेषज्ञ: “यह फैसला सरकारी अधिकारियों के लिए चेतावनी है कि उनके निर्णय पारदर्शी हों।”

  • अधिवक्ता प्रिया मिश्रा: “अग्रिम जमानत का आधार यह है कि शर्मा से भागने या सबूत मिटाने का खतरा नहीं है।”


निष्कर्ष: यह फैसला सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही और न्यायिक प्रक्रिया के संतुलन को दर्शाता है। जबकि FIR बरकरार रहने से गंभीर आरोपों की जांच जारी रहेगी, अग्रिम जमानत शर्मा को न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग का मौका देती है।


✍️ लेखक: Shruti Mishra, वरिष्ठ कानून संवाददाता
स्रोत: सुप्रीम कोर्ट का आदेश (28 फरवरी 2025), FIR संख्या 33/2011

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