लेकिन क्या अदालत ऐसी कोई भी शर्त लगा सकती है?
सुप्रीम कोर्ट ने Frank Vitus v. Narcotics Control Bureau मामले में जमानत की शर्तों से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों पर विचार किया। 8 जुलाई 2024 के फैसले के बाद 6 जनवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले में एक और आदेश जारी किया।
जमानत देते समय अदालत आरोपी पर ऐसी शर्तें लगा सकती है जो मामले की परिस्थितियों और न्यायिक प्रक्रिया की आवश्यकताओं से संबंधित हों।
उदाहरण के लिए अदालत आरोपी को:
जांच में सहयोग करने,
गवाहों को प्रभावित नहीं करने,
सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करने,
अदालत में उपस्थित रहने,
विदेश यात्रा से पहले अनुमति लेने,
पासपोर्ट जमा करने जैसी शर्तों का पालन करने का निर्देश दे सकती है।
हालांकि प्रत्येक मामले में लगाई जाने वाली शर्तें मामले के तथ्यों और लागू कानून पर निर्भर करती हैं।
Frank Vitus v. Narcotics Control Bureau मामले में आरोपी के खिलाफ Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act, 1985 की कुछ धाराओं के तहत अभियोजन चल रहा था।
आरोपी को जमानत देते समय कुछ शर्तें लगाई गई थीं। विवाद विशेष रूप से ऐसी शर्तों से जुड़ा था जिनमें आरोपी की गतिविधियों और भारत में उसकी उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त आवश्यकताएं शामिल थीं।
सुप्रीम कोर्ट ने 8 जुलाई 2024 को इस मामले में फैसला दिया। इस निर्णय की रिपोर्टेड citation 2024 INSC 479 है।
Frank Vitus मामले में जमानत की एक शर्त Google Maps के माध्यम से आरोपी की वास्तविक समय की लोकेशन जांच अधिकारी के साथ साझा करने से संबंधित थी।
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी शर्त को स्वीकार नहीं किया और जमानत की शर्तों को आरोपी के मौलिक अधिकारों तथा मामले की वास्तविक आवश्यकता के अनुरूप रखने पर जोर दिया।
इससे यह महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है कि जमानत की शर्त लगाते समय अदालत को यह देखना चाहिए कि शर्त का उद्देश्य और उसका प्रभाव मामले की परिस्थितियों के अनुरूप है या नहीं।
Frank Vitus मामले में एक शर्त विदेशी नागरिक के High Commission से ऐसा certificate of assurance प्राप्त करने से संबंधित थी, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि आरोपी भारत नहीं छोड़ेगा और आवश्यकता पड़ने पर अदालत के सामने उपस्थित होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी शर्त को जमानत के लिए आवश्यक नहीं माना।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि विदेशी नागरिक जमानत मिलने के बाद बिना किसी प्रतिबंध के भारत छोड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 6 जनवरी 2025 के आदेश में स्पष्ट किया कि विदेशी नागरिकों पर Foreigners Act, 1946 तथा उससे संबंधित नियमों और आदेशों के तहत अलग-अलग कानूनी प्रावधान लागू हो सकते हैं।
कोर्ट ने कहा कि विदेशी नागरिक को जमानत देते समय संबंधित अदालत राज्य या अभियोजन एजेंसी को निर्देश दे कि जमानत का आदेश संबंधित Registration Officer को तुरंत उपलब्ध कराया जाए।
Registration Officer इसके बाद संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी दे सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 6 जनवरी 2025 के आदेश में कहा कि प्रत्येक विदेशी नागरिक की bail application में Civil Authority या Registration Officer को पक्षकार बनाना आवश्यक नहीं है।
कोर्ट के अनुसार, ऐसे अधिकारियों को हर मामले में पक्षकार बनाने से जमानत आवेदन के निर्णय में अनावश्यक देरी हो सकती है।
हालांकि संबंधित अधिकारियों को जमानत दिए जाने की जानकारी उपलब्ध कराने के लिए अदालत ने विशेष दिशा-निर्देश दिए।
सुप्रीम कोर्ट ने Frank Vitus मामले में मुख्य रूप से यह निर्देश दिया कि:
किसी विदेशी नागरिक को जमानत देते समय संबंधित अदालत राज्य या अभियोजन एजेंसी को जमानत आदेश की जानकारी संबंधित Registration Officer को तुरंत देने का निर्देश दे।
Registration Officer यह जानकारी संबंधित अधिकारियों, जिसमें Civil Authorities भी शामिल हैं, को दे।
हर bail application में Civil Authority या Registration Officer को अनिवार्य रूप से पक्षकार बनाना आवश्यक नहीं है।
Foreigners Act और संबंधित नियमों के तहत अधिकारियों की शक्तियां जमानत देने वाली criminal court की शक्ति से अलग हैं।
नहीं, जमानत की शर्तें मामले के उद्देश्य से संबंधित और कानून के अनुरूप होनी चाहिए।
जमानत की शर्त का उद्देश्य आम तौर पर यह सुनिश्चित करना होता है कि आरोपी:
जांच में सहयोग करे;
अदालत में उपस्थित रहे;
गवाहों या सबूतों को प्रभावित न करे;
कानून द्वारा निर्धारित अन्य आवश्यकताओं का पालन करे।
हर मामले में अदालत द्वारा लगाई जाने वाली शर्त अलग हो सकती है।
इसलिए किसी एक मामले में लगाई गई शर्त को हर दूसरे मामले पर स्वतः लागू नहीं किया जा सकता।
Bail का अर्थ है कि आरोपी को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत हिरासत से रिहा किया जाता है, जबकि Bail Conditions वे शर्तें हैं जिनका पालन आरोपी को जमानत पर बाहर रहने के दौरान करना होता है।
उदाहरण:
यदि अदालत किसी आरोपी को जमानत देती है और उसे जांच अधिकारी के सामने उपस्थित होने का निर्देश देती है, तो जमानत रिहाई है और जांच में उपस्थित होना उसकी जमानत की शर्त हो सकती है।
नहीं।
जमानत का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने आरोपी को अपराध से बरी कर दिया है।
जमानत और अंतिम दोषसिद्धि/दोषमुक्ति अलग-अलग कानूनी चरण हैं। किसी व्यक्ति को जमानत मिलना अपने आप में यह तय नहीं करता कि वह अंततः दोषी है या निर्दोष।
इस मामले से यह समझने में मदद मिलती है कि जमानत की शर्तें लगाते समय अदालत को मामले की परिस्थितियों, कानूनी अधिकारों और न्यायिक प्रक्रिया के बीच संतुलन रखना होता है।
विशेष रूप से विदेशी नागरिकों से संबंधित मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि criminal court द्वारा bail देने की शक्ति और Foreigners Act के तहत प्रशासनिक अधिकारियों की शक्तियां अलग-अलग हैं।
Bail condition वह कानूनी शर्त है जिसका पालन आरोपी को जमानत पर रिहा होने के बाद करना होता है।
नहीं। जमानत की शर्तें मामले के तथ्यों, आरोपों, लागू कानून और अदालत के आदेश पर निर्भर करती हैं।
नहीं। जमानत का अर्थ मुकदमे का समाप्त होना नहीं है।
मामले की परिस्थितियों और लागू कानून के अनुसार अदालत उचित शर्तें लगा सकती है। विदेशी नागरिकों के मामले में Foreigners Act और संबंधित नियम भी लागू हो सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने Frank Vitus मामले में कहा कि हर bail application में Civil Authority या Registration Officer को पक्षकार बनाना आवश्यक नहीं है।
8 जुलाई 2024 के निर्णय की citation 2024 INSC 479 है। 6 जनवरी 2025 को इसी मामले में आगे का आदेश 2025 INSC 30 के रूप में जारी हुआ।
जमानत देते समय अदालत द्वारा लगाई गई शर्तों का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को सुरक्षित रखना और आरोपी की अदालत तथा जांच प्रक्रिया में उपलब्धता सुनिश्चित करना होता है।
Frank Vitus v. Narcotics Control Bureau मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जमानत की शर्तों और विदेशी नागरिकों से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार किया। 6 जनवरी 2025 के आदेश में कोर्ट ने विदेशी नागरिक को जमानत दिए जाने की सूचना संबंधित Registration Officer तक पहुंचाने की प्रक्रिया के संबंध में भी निर्देश दिए।
महत्वपूर्ण: किसी व्यक्ति के वास्तविक मामले में bail या bail condition का परिणाम उसके मामले के तथ्यों, लागू कानून और संबंधित अदालत के आदेश पर निर्भर करता है। यह लेख केवल सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है।
Supreme Court of India — Frank Vitus v. Narcotics Control Bureau, 2024 INSC 479.
Supreme Court of India — Frank Vitus v. Narcotics Control Bureau, 2025 INSC 30.
