संपत्ति स्वामित्व विवाद: 96 साल पुराने मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दिया अंतिम फैसला
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संपत्ति विवाद: 1929 से चली आ रही कानूनी लड़ाई का अंत
मद्रास (चेन्नई) के एक पुराने संपत्ति स्वामित्व विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने 25 मार्च, 2025 को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। यह मामला 0.75 सेंट की जमीन के स्वामित्व को लेकर 1929 से चल रहा था, जिसमें वसीयत, कोर्ट नीलामी और ट्रस्ट के दावों का पेचीदा ताना-बाना शामिल था। कोर्ट ने अंततः 1992 की चार सेल डीड्स को रद्द करते हुए संपत्ति को वसीयत के अनुसार विनयागमूर्ति और उनके बच्चों के नाम कर दिया।

मामले की जड़ें: 1929 की खरीद से शुरुआत
1929: सोमासुंदरम चेट्टियार ने 0.75 सेंट जमीन खरीदी।
1952: पद्मिनी चंद्रशेखरन (सोमासुंदरम की भांजी) ने संपत्ति पर दावा करते हुए मुकदमा दायर किया।
1962: कोर्ट ने संपत्ति को नीलाम कर पद्मिनी के नाम कर दिया। इसी साल सोमासुंदरम ने अपने दत्तक पुत्र (डिफेंडेंट 1) के नाम वसीयत लिखी।
1975: पद्मिनी ने अपनी वसीयत में जमीन को विनयागमूर्ति और उनके बच्चों के नाम किया।
1992: डिफेंडेंट 2 ने डिफेंडेंट 3-6 को जमीन बेच दी, जिसे चुनौती दी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों रद्द की 1992 की सेल डीड्स?
कोर्ट ने तीन प्रमुख बिंदुओं पर फैसला दिया:
1962 की नीलामी अंतिम: पद्मिनी ने कोर्ट नीलामी के जरिए 1962 में ही संपत्ति का स्वामित्व हासिल कर लिया था।
वसीयत का दावा खोखला: सोमासुंदरम की 1962 की वसीयत तब लिखी गई जब संपत्ति पहले ही पद्मिनी के नाम हो चुकी थी।
1992 की सेल डीड्स अवैध: डिफेंडेंट 1-2 के पास संपत्ति बेचने का कोई अधिकार नहीं था।
कोर्ट ने कहा: “जब संपत्ति पहले ही कानूनी तौर पर पद्मिनी के नाम हो चुकी थी, तो डिफेंडेंट्स द्वारा बेची गई सेल डीड्स कागजी घोड़े जैसी हैं।”
संक्षेप में:
सुप्रीम कोर्ट ने 96 साल पुराने संपत्ति विवाद के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। मुख्य बिंदु:
कोर्ट नीलामी का महत्व: 1962 में पद्मिनी चंद्रशेखरन ने संपत्ति कोर्ट नीलामी के जरिए खरीदा था। 1963 में सेल डीड भी बन चुका था।
विरोधाभासी वसीयत: सोमासुंदरम चेट्टियार ने 1962 में ही इसी संपत्ति को अपने दत्तक पुत्र के नाम वसीयत कर दिया, जो अमान्य ठहराया गया।
“मोल्डिंग ऑफ रिलीफ”: कोर्ट ने तथ्यों के आधार पर राहत (Relief) को संशोधित करते हुए पद्मिनी की वसीयत के एक्जीक्यूटर के पक्ष में फैसला दिया। इसका उद्देश्य लंबित मुकदमों को कम करना और न्याय सुनिश्चित करना था।
निर्णय: 1992 की सेल डीड्स रद्द कर संपत्ति विनयागमूर्ति और उनके बच्चों को सौंपी गई।
“मोल्डिंग ऑफ रिलीफ” क्या है?
यह सिद्धांत कोर्ट को यह अधिकार देता है कि वह मामले के तथ्यों के आधार पर मांगी गई राहत से अलग, न्यायसंगत फैसला दे सके। इस केस में:
समस्या: ट्रस्ट (प्लेंटिफ) संपत्ति पर सीधा दावा साबित नहीं कर पाया।
समाधान: कोर्ट ने पद्मिनी की वसीयत के एक्जीक्यूटर (H.B.N. शेट्टी) के पक्ष में फैसला दिया ताकि वसीयत लागू हो सके।
लाभ: 96 साल के विवाद को नए मुकदमे के बिना ही समाप्त कर दिया गया।
फैसले का असर: भविष्य के संपत्ति विवादों के लिए सबक
दस्तावेजों की अहमियत: कोर्ट नीलामी और वसीयत के दस्तावेजों को अंतिम माना गया।
समय सीमा: विवादित लेनदेन को तुरंत चुनौती देना जरूरी है।
ट्रस्ट की भूमिका: ट्रस्टीज़ को स्पष्ट दस्तावेजी प्रमाणों के साथ केस लड़ना चाहिए।
यह फैसला दिखाता है कि कानूनी प्रक्रियाओं में दस्तावेजों और समयबद्धता का कितना महत्व है। संपत्ति विवादों में न्याय पाने के लिए सबूतों की मजबूती और कानूनी सजगता ही कुंजी है।
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