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सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल PG आरक्षण नियमों पर जनहित याचिका खारिज की: “व्यक्तिगत मामलों में ही होगा निराकरण”

25 फरवरी 2025, नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के मेडिकल PG प्रवेश नियमों को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी है। जस्टिस बी.आर. गवाई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मैसिह की पीठ ने कहा कि “आरक्षण नीति के प्रभाव को लेकर सामान्य PIL में फैसला नहीं हो सकता।…

25 फरवरी 2025, नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के मेडिकल PG प्रवेश नियमों को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी है। जस्टिस बी.आर. गवाई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मैसिह की पीठ ने कहा कि “आरक्षण नीति के प्रभाव को लेकर सामान्य PIL में फैसला नहीं हो सकता। ऐसे मुद्दे व्यक्तिगत मामलों में ही उठाए जाने चाहिए।” यह याचिका ऑल इंडिया बैकवर्ड क्लासेस फेडरेशन द्वारा दायर की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि राज्यों के नियम पिछड़े वर्गों के आरक्षित सीटों को कम कर रहे हैं। मेडिकल PG आरक्षण संबंधित जनहित याचिका दर्ज कि|


मेडिकल पीजी आरक्षण  जनहित याचिका एक विस्तृत दृष्टिकोण?

  • 2013 और 2017 के नियम: आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के मेडिकल PG प्रवेश नियमों के नियम II(viii) और (ix) को चुनौती दी गई।

  • MRC का मुद्दा: याचिका में दावा किया गया कि मेरिटोरियस रिजर्व्ड कैंडिडेट्स (MRC) को ओपन कैटेगरी में मिली सीटों के बाद भी आरक्षित सीटें कम नहीं होनी चाहिए।

  • उदाहरण: यदि एक SC उम्मीदवार मेरिट के आधार पर ओपन सीट पाता है, तो उसकी SC सीट किसी अन्य SC उम्मीदवार को मिलनी चाहिए। नियम इसकी अनुमति नहीं देते, जिससे आरक्षण का प्रतिशत घटता है।


सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु

  1. PIL की सीमाएँ: कोर्ट ने कहा कि आरक्षण नीति के प्रभाव जैसे जटिल मुद्दों को “सामान्य जनहित याचिका” में नहीं सुलझाया जा सकता। ऐसे मामले व्यक्तिगत शिकायतों के आधार पर ही देखे जा सकते हैं।

  2. कानूनी सिद्धांतों की पुष्टि: कोर्ट ने इंद्रा साहनी केस (1992) और आर.के. सभरवाल केस (1995) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार यदि मेरिट पर ओपन सीट पाते हैं, तो उन्हें “जनरल कैटेगरी” में गिना जाना चाहिए।

  3. राज्यों की भूमिका: आंध्र प्रदेश ने अपने नियम संशोधित कर लिए हैं, जबकि तेलंगाना को कोर्ट ने निर्देश दिया कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुरूप नियम बनाए।


क्यों खारिज हुई याचिका? कोर्ट की मुख्य दलीलें

  • अमूर्त मुद्दा: पीठ ने कहा कि बिना किसी विशिष्ट उम्मीदवार के केस के, आरक्षण के प्रभाव का आकलन करना “थ्योरेटिकल” होगा।

  • पक्षकारों की अनुपस्थिति: याचिका में उन उम्मीदवारों को पक्ष नहीं बनाया गया, जो कोर्ट के फैसले से प्रभावित हो सकते थे।

  • न्यायिक नीति: सुप्रीम कोर्ट ने एस.पी. गुप्ता केस (1981) का हवाला देते हुए कहा कि PIL केवल उन्हीं मामलों में स्वीकार्य है, जहाँ सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को न्याय नहीं मिल रहा हो।


विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया

  • डॉ. राजीव धवन, संवैधानिक विशेषज्ञ: “यह फैसला PIL की सीमाओं को रेखांकित करता है। आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दों में कोर्ट सामान्यीकृत निर्णय लेने से बचता है।”

  • अधिवक्ता प्रतीक सिन्हा: “तेलंगाना को अब नए नियम बनाने होंगे। यह फैसला भविष्य में आरक्षण से जुड़े विवादों को व्यक्तिगत स्तर पर ही सुलझाने का मार्गदर्शन करता है।”


क्या है MRC नियम?

  • MRC (Meritorious Reserved Candidates): आरक्षित वर्ग के वे उम्मीदवार जो मेरिट के आधार पर ओपन सीट प्राप्त करते हैं।

  • सुप्रीम कोर्ट का स्टैंड: MRC को ओपन कैटेगरी में गिना जाना चाहिए, ताकि आरक्षित सीटें अन्य पिछड़े उम्मीदवारों के लिए बनी रहें।

  • विवाद का कारण: कुछ राज्यों के नियम MRC को ओपन सीट लेने के बाद भी आरक्षित सीट का लाभ देते हैं, जिससे आरक्षण का कोटा प्रभावित होता है।


इतिहास में आरक्षण से जुड़े Landmark फैसले

  1. इंद्रा साहनी केस (1992):

    • 50% आरक्षण की सीमा तय की गई।

    • MRC को ओपन कैटेगरी में गिनने का सिद्धांत दिया।

  2. आर.के. सभरवाल केस (1995):

    • आरक्षित पदों को रोस्टर के अनुसार भरने का निर्देश।

    • “क्रीमी लेयर” की अवधारणा को मंजूरी।

  3. समता आंदोलन समिति केस (2014):

    • मेडिकल प्रवेश में आरक्षण के नियमों को चुनौती।

    • कोर्ट ने राज्यों को नीतियाँ बनाने की स्वतंत्रता दी।


आगे की राह: तेलंगाना के लिए चुनौती

  • नियम संशोधन: तेलंगाना को अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार MRC नियमों में बदलाव करना होगा।

  • डेटा पारदर्शिता: आरक्षित सीटों के आवंटन में पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी।

  • उम्मीदवारों को जागरूकता: MRC उम्मीदवारों को उनके अधिकारों के बारे में शिक्षित करना होगा।


निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय न्यायिक प्रणाली की “सावधानीपूर्ण न्यायशास्त्र” को दर्शाता है। आरक्षण जैसे जटिल मुद्दों को सामान्य PIL के बजाय व्यक्तिगत मामलों में ही सुलझाने का दृष्टिकोण न्यायिक संसाधनों का最佳 उपयोग सुनिश्चित करेगा।


✍️ लेखक: Shruti Mishra, वरिष्ठ न्यायिक संवाददाता
स्रोत: सुप्रीम कोर्ट का आदेश (WP(C) 452/2019), 25 फरवरी 2025 Click Here to Download Judgement सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल PG

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